नहीं अब पल भी नहीं सहूंगी...
इस तरह मेरी तरफ तुम्हारी बेरुखी को...
आज ख़त्म कर दूंगी हर दर्द के उस अहसास को...
जिसे दे कर तुम मुझसे प्यार का दावा करते हो....
फिर कोई बात नहीं
गर....
रिश्तों की ये डोर मेरे हाथ से छूट गई...
मैं अपने बचे खुचे वजूद के साथ ही जी लूंगी...
कम से कम सड़क की भीड़
में...
यूँ अकेले रहने का अहसास तो ख़त्म होगा...
हाँ नहीं दिखाऊंगी तुम्हें...
अपने उन सवालों के ज़ख्म...
जो कभी किये थे मैंने लेकिन...
तुमने कभी उनके जवाब नहीं दिए...
और हाँ नहीं रखूंगी मेरे कंधों पर...
तुम्हारे प्यार के निशान...
क्यूंकि वैसे ही निशान....
तुमने औरों को भी दिए है...
हाँ मैं मिटा रही हूँ इन्हें...
दूर तक फैली हरी दूब की नर्मी से...
सुबह ओस की ठंडक से...
दुपहर को धूप की गर्मी से...
और शाम की सिन्दूरी आभा से....
धो रही हूँ तुम्हारे यादों के निशान...
क्यूंकि अब तुम मेरे राजदार नहीं
रहे....