Wednesday, April 13, 2011

हाँ मुझमे अहसास अभी बाकी हैं

धरती की तरह सहनशील हूं मैं...

लेकिन पत्थर नही हूं...

हाँ मुझमें अह्सास अभी बाकी हैं...

कई तूफां आये और चले गये...

लेकिन ज़िन्दगी थमी नही है...

हाँ इसकी रफ्तार अभी बाकी हैं...

हाँ मुझमें अह्सास अभी बाकी हैं...

मुझे सताने वालों ने बदले है पैंतरे कई...

लेकिन मैं अब तक हारी नही हूँ...

हाँ मुझमे जीत का जज़्बा बाकी हैं...

हाँ मुझमे अह्सास अभी बाकी हैं

अर्चना

Friday, January 14, 2011

कशमकश

इन दिनों एक कशमकश में उलझी है जिंदगी...
जहाँ पर मैं खड़ी हूँ...
क्या वो सही मकाम है...
क्या एक क़दम आगे बढ़ाऊँ...
या दो क़दम पीछे हट जाऊ...
समझ नहीं पाती हूँ...
जब भी सोचती हूँ...
क्या अब तक जो किया...
वो सही किया...
या जो आगे करना चाहती हूँ...
वो सही होगा...
या सब कुछ यही छोड़कर...
बहने दूं जिंदगी की धारा को...
फिर देखूं तो सही...
कहाँ ले जाती है ये मुझे...
या फिर रुख मोड़ दूँ उस धारा का...
जो मुझे मुझ तक पहुँचने नहीं दे रही लेकिन...
दावा करती है की एक दिन मकाम पर ज़रूर ले जाएगी....
हालाँकि आज कहने को....
मकान, दीवारें, छत और दरवाजे...
कुछ भी नहीं है मेरे पास....
है तो बस तकदीर की कुछ बाकि बची उम्मीदें...
कुछ नन्हे से हौसले...
हाँ कुछ यारों के धोखे भी है ...
और कुछ दर्द सहे-अनसहे से...
कुछ संबंधों की दरारें भी है...
जिन्हें भरने की कोशिश में...
जहाँ भी पहुँचती हूँ...
वहाँ मेरे अलावा बहुत कुछ होता है लेकिन...
मुझे मुझ तक पहुँचने के लिए...
शायद कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा...
समझ नहीं आ रहा
एक क़दम आगे बढ़ाऊँ...
या दो क़दम पीछे हट जाऊ...
अर्चना...

Sunday, December 19, 2010

जब वो लड़की थी...

जब वो लड़की थी...
यूँ ही अपने संसार में...
भटकती थी...
दौड़कर चढ़ जाती थी...
उम्मीदों के पहाड़...
उछलकर आसमान तोड़ लाती...
आशाओं के तारे...
यूँ ही पेड़ की इस डाली से उस डाली...
चहकती थी बुलबुल की तरह...
कभी साइकिल...
तो कभी स्कूटर उठा...
पूरे शहर का चक्‍कर लगाती...
घर की छत से पैर लटकाकर
कैरी का अचार चुरा कर खाती...
पहाड़ी झरने-सी बहती...
चंचल हवा के झोको से उड़ कर...
चाँद को छू आना चाहती थी...
आसमान के सारे सितारे...
अपने दुपट्टे में सजाना चाहती...
सोचती थी....
जाएगी एक दिन दूर कहीं सजन के द्वार....
जहाँ दिन होगा चांदी का...
रात सोने की...
लेकिन...
जब उसकी उम्मीद टूटी तो पाया...
समझोतों की एक लम्बी फेहरिस्त में जहाँ...
वो बहू है...
पत्नी है...
माँ है...
और अब सास भी बन जाएगी....
लेकिन...
अब वो लड़की कुछ और नहीं चाहती...
ना धरती...
ना आसमान...
ना ही चाँद तारे...
ना ही सायकिल...
और ना स्कूटर की सवारी...
ना बुलबुल की तरह चहकना...
न कैरी का आचार खाना..
ना पहाड़ी झरने की तरह बहना....
ना चंचल हवा सा बहना...
वो तो बस चौराहे तक चली जाती कभी-कभी...
अपनी मन पसंद सब्जी लेने...
बस इतनी ही आज़ादी है उसे...
अब यही उसकी उडान है...
यही उसकी परवाज़ है...
अर्चना...

Thursday, December 16, 2010

अब तुम मेरे राजदार नहीं रहे...

नहीं अब पल भी नहीं सहूंगी...
इस तरह मेरी तरफ तुम्हारी बेरुखी को...
आज ख़त्म कर दूंगी हर दर्द के उस अहसास को...
जिसे दे कर तुम मुझसे प्यार का दावा करते हो....
फिर कोई बात नहीं गर....
रिश्तों की ये डोर मेरे हाथ से छूट गई...
मैं अपने बचे खुचे वजूद के साथ ही जी लूंगी...
कम से कम सड़क की भीड़ में...
यूँ अकेले रहने का अहसास तो ख़त्म होगा...
हाँ नहीं दिखाऊंगी तुम्हें...
अपने उन सवालों के ज़ख्म...
जो कभी किये थे मैंने लेकिन...
तुमने कभी उनके जवाब नहीं दिए...
और हाँ नहीं रखूंगी मेरे कंधों पर...
तुम्हारे प्यार के निशान...
क्यूंकि वैसे ही निशान....
तुमने औरों को भी दिए है...
हाँ मैं मिटा रही हूँ इन्हें...
दूर तक फैली हरी दूब की नर्मी से...
सुबह ओस की ठंडक से...
दुपहर को धूप की गर्मी से...
और शाम की सिन्दूरी आभा से....
धो रही हूँ तुम्हारे यादों के निशान...
क्यूंकि अब तुम मेरे राजदार नहीं रहे....

AddThis

Thursday, October 28, 2010

और उम्र गुज़र गयी...अर्चना...

तेरे एक वादे पे उम्र गुज़र गयी अपनी...
और एक तू है की यकी करता ही नहीं...
अब मैं पशेमा हूँ की बाकि की उम्र किसके नाम करू...
ना वादा अपना...ना यकी अपना...
हाँ थोडा सा तेरा अहम् और मेरी थोड़ी सी जिद बाकि बची है...
सोच रही हूँ क्या काफी है बाकि की गुज़र के लिए...
फिर सोचती हूँ....
नहीं उसी वादे के नाम कर दूँ अपनी चंद सांसों को...
शायद उसकी तपिश तुम्हारे अहम् को पिघला दे...
और नेस्तनाबूद कर दे मेरी जिद को...
जिसने हम दोनों को जीने ना दिया...
और जिसने उम्र को गुज़र जाने दिया ऐसे...
की जैसे रेत फिसल गयी हो मुठ्ठी से...
अर्चना...

Saturday, August 28, 2010

मेरी आशाएं...

सोच रही हूँ शाम ढलने से पहले बुहार दूँ...
अपने आँगन से कुछ निराशाएं क्यूंकि...
ख्वाब में ही सही कुछ आशाओं ने...
अपने आने की बात कही है...
हाँ उनके साथ कुछ पुरानी यादों को भी...
मैं बाहर का रास्ता दिखा दूँ क्यूंकि...
कब तक उन्हें मेहमान बना कर रखूंगी जबकि...
अब अतिथि देवो भव का ज़माना कबसे गुज़र गया है...
हाँ अब इस सच को स्वीकार करना ही होगा...
कि इस दुनिया में अहसास और जज़्बात की...
कोई कीमत नहीं है फिर भी...
इस दुनिया के बाज़ार में कुछ लोग बिना मोल बिकते है...
और हमे उनकी भीड़ में अपने आपको ढूँढना है...
और उन्ही कुछ आशाओं के साथ...
जो कभी भी ख़्वाबों में आ सकती हैक्यूंकि...
ख्वाब मेरे अपने है...
हाँ वही तो मेरे अपने है...
और हाँ आशायीं भी मेरी अपनी है...
और अब बस निराशाओं को पराया बनाना है...
सो सोच रही हूँ आज शाम ढलने तक ये काम कर ही दूँ...
क्यूँ कर दूँ ना...?
अर्चना

Tuesday, July 27, 2010

हाँ मैं जी लूंगी

उम्र के इस मुकाम पर अलविदा का अहसास भी कितना दर्द देता है लेकिन...
तुमने तो कल शब् मुझे वो दर्द दे ही दिया...
कोई बात नहीं दर्द तो दर्द ही सही कुछ तो दिया है तुमने...
कुछ तो ऐसा है मेरे पास ऐसा जिसके सहारे...
मैं अपनी यादों की किश्तों से अपनी जिंदगी का क़र्ज़ उतार लूंगी...
हाँ मैं जी लूंगी...

सुनो तुम मेरी फिक्र ना करना क्योंकि फिक्र इंसान की दुश्मन है....
और मैं नहीं चाहती की मेरी कोई चीज़ तुम्हारी दुश्मन बने...
क्यूंकि मैं तो एकतरफा प्यार और दोस्ती की वो जिंदा मिसाल हूँ...
जिसे तुम याद करना ना चाहो बेशक...
लेकिन अपने ज़ेहन के पिंजरे में एक परिंदे की तरह मुझे कैद ज़रूर रखोगे...
और हाँ मैं उसी कैद का अहसास कर के तुम्हे याद कर लूंगी...
हाँ मैं जी लूंगी...

हाँ मैं जी लूंगी

अर्चना