Thursday, October 28, 2010

और उम्र गुज़र गयी...अर्चना...

तेरे एक वादे पे उम्र गुज़र गयी अपनी...
और एक तू है की यकी करता ही नहीं...
अब मैं पशेमा हूँ की बाकि की उम्र किसके नाम करू...
ना वादा अपना...ना यकी अपना...
हाँ थोडा सा तेरा अहम् और मेरी थोड़ी सी जिद बाकि बची है...
सोच रही हूँ क्या काफी है बाकि की गुज़र के लिए...
फिर सोचती हूँ....
नहीं उसी वादे के नाम कर दूँ अपनी चंद सांसों को...
शायद उसकी तपिश तुम्हारे अहम् को पिघला दे...
और नेस्तनाबूद कर दे मेरी जिद को...
जिसने हम दोनों को जीने ना दिया...
और जिसने उम्र को गुज़र जाने दिया ऐसे...
की जैसे रेत फिसल गयी हो मुठ्ठी से...
अर्चना...

9 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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  2. archna ji ek lambe antral ke baad dil ki gahrai me utar jane wali rachna. achchha laga. shukriya.

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  3. हां थोड़ा सा तेरा अहम और मेरी थोड़ी सी जिद बाकी बची है...
    इसी जिद और अहम के इर्द-गिर्द तो ज़िदगी का चक्र घूमता है...बहुत अच्छी रचना।

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  4. नहीं उसी वादे के नाम कर दूँ अपनी चंद सांसों को...
    शायद उसकी तपिश तुम्हारे अहम् को पिघला दे...
    और नेस्तनाबूद कर दे मेरी जिद को...
    जिसने हम दोनों को जीने ना दिया...
    और जिसने उम्र को गुज़र जाने दिया ऐसे...
    की जैसे रेत फिसल गयी हो मुठ्ठी से...
    Nihayat sundar bhaav aur alfaaz! Wah!

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  5. बहुत ही बेहतरीन रचना,,...
    काफी सारा अर्थ छुपा है इसमें, बार बार पढने योग्य.

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  7. आपने वाकई पशोपेश में डाल दिया.........क्या करना उचित होगा.......और क्या नहीं ?
    .......चंद साँसों की को वादे के नाम करना अच्छा है /
    खुद की जिद को नेस्तनाबूद करने की चाहत स्त्री को विशिष्ट और महान बनाती है /
    आपकी इस रचना में बादल,गरज और वारिश भी है /
    सादर नमन

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