Wednesday, January 20, 2010

कुछ बरसो पहले चला था एक कारवां...जो आज तक बदस्तूर जारी हैं लेकिन...अब उस कारवां में बस एक ही मुसाफिर बचा हैं....और वो हैं मेरा एक नन्हा सा वजूद...वो वजूद जो बिखरा तो कई बार लेकिन...फिर भी आज तक कायम हैं...शायद अब भी मंजिल को पाने की एक छोटी सी उम्मीद कहीं सांसे ले रही हैं ऐसे की जैसे....कोई ठन्डे पानी का झरना किसी सहरा में बहता हो ...की जैसे कोई कश्ती किसी तूफ़ा से लडती हो...की जैसे कोई दीये की लौ तेज़ हवाओं में टिमटिमा रही है ऐसे की जैसे कह रही हो तूफ़ा से....ऐह तूफ़ा तू चाहे जितने जतन कर ले...मेरा ये नन्हा सा वजूद...और मेरी नन्ही सी उम्मीद हमेशा रहेगी कायम...क्यूंकि मजिल के उस पार...कोई हैं जो मेरी मंजिल हैं...वो मेरी जिंदगी हैं...मेरी रौशनी हैं...मेरी ख़ुशी...मेरा विश्वास हैं वो...वो कभी तो मिलेगा मुझे...क्यूंकि मेरे वजूद की एक सच्ची आस हैं वो... अर्चना...

3 comments:

  1. बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. rachna ji agar aap rachna ke sath tasviro lagaye to aur bhi sunder lage...

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  3. aapkee saaree rachnaayen gambheer hain.......yah gaan aah se upjaa hai.aawaaz apane lakshya tak pahunche ...yahee kaamanaa hai.

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