Friday, January 29, 2010

कोई जाने या ना जाने लेकिन तुम जानते हो की तुम्‍हारा होना मेरी ज़िंदगी में ऐसे है, जैसे धरती पर कई सूरज एक साथ जगमगाते हो...ऐसे की जैसे कई चाँद अपनी ठंडक से मेरी रूह को सकून देते हो...ऐसे की जैसे जैसे कई जूगनू मेरे आँगन में दमकते हो...ऐसा जैसे सुहागन के माथे पर कई सिन्दूरी कण चमकते हो...ऐसा की जैसे जूही के फूलों के कई गजरे महकते हो...ऐसा की जैसे जाड़ों के मौसम में लोग धूप तापते हो...ऐसा की जैसे बारिश की पहली फुहार में बच्चे नहाते हो...ऐसा की जैसे गाँव में सावन में झूले पड़ते हो...ऐसा की जैसे दुल्हन के हाथों में मेहँदी के फूल रचते हो...ऐसा की जैसे ओंस की शबनमी बुँदे गुलशन को भिगोते हो...ऐसा की जैसे दुनिया की भीड़ में बच्चे माँ के आँचल में छिपते हो...ऐसा की जैसे कई गुल एक सेहरा में खिलते हो...ऐसा की जैसे पहले प्यार में दो दिल धड़कते हो...ऐसा की जैसे दूर कहीं धरती और गगन मिलते हो...और मिल कर कभी ना बिछड़ेंगे ये वादा भी करते हो...लेकिन नहीं जानती की तुम्हारा होना मेरे लिए जितना बड़ा सच है...क्या तुम्हारे लिए भी है...शायद नहीं...तभी तो मैं तुम्हारी हो कर जी रही हूँ...और तुम केवल होने के अहसास के साथ वही खड़े हो...जहाँ से हमारे प्यार का सफ़र शुरू हुआ था... अर्चना...

2 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    Email- sanjay.kumar940@gmail.com

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  2. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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