Saturday, February 6, 2010

मेरी कविता...मेरा जीवन...जो मेरे जीवन का आधार है...वो मुझसे अचानक रूठ गई...और चली गई दूर कहीं...और फिर कई दिनों तक नहीं हुई हमारी मुलाकात...मुझे लगा जैसे सब चले जाते है...वैसे ये भी चली गई है...और एक दिन खुद ही लौट आएगी...जैसे सब लौट आते है एक अंतराल के बाद...और आते ही तपाक से मिल भर लेगी बाँहों में...और धर देगी मेरी आँखों पर अपने नर्म और कोमल हाथ....और पूछेगी एक सहेली की तरह...बताओ कौन? और मैं चहक उठूंगी किसी बुलबुल की तरह...और कहूँगी तुम हो मेरी कविता...मेरी जिंदगी....और हाँ फिर झूट-मूठ रूठ कर पूछूंगी...की तुम क्यूँ चली गई थी कविता ! कहाँ रही तुम इतने दिन? मैंने तुम्हे कई महीनों, बरसों तक ढूंढ़ा...और अब मिली हो तो पहचानी नहीं जाती क्या यह तुम ही हो कविता? लेकिन अफ़सोस एक दिन जब वो मिली ...तो ना जाने क्यूँ हम एक दूसरे को पहचान कर भी पहचानने का अभिनय करते रहे...ना उसने मुझे गले ही लगाया...और ना ही मेरी आँखों को मूंदा ...और हाँ हम दोनों के बीच एक अजीब सा फासला था...जो कहने को तो एक पल का था...लेकिन उस में दूरियां सदियों की थी....और जिसे ना तो वो तय कर पा रही थी...और ना ही मैं....हम दोनों साहिल के उन दो किनारों की तरह एक दूसरे को बेवजह देखे जा रहे थे....और सोच रहे थे...की हाँ कुछ रिश्ते ऐसे होते है...जो ना बन पाते है..ना तोड़े जाते है...क्यूंकि वो दर्द के रिश्ते होते है...बस तब से ले कर आज तक मेरा और मेरी कविता के बीच यही दर्द का रिश्ता है...और हम ये रिश्ता बखूबी निभा रहे है....अर्चना....

3 comments:

  1. खूबसूरत कविता. रिश्तों के झीने परदे के पार एक आत्मीय स्पर्श बुनते शब्द.

    ReplyDelete
  2. shukriya Kishor...Kshama... :)

    ReplyDelete